लघु कथा-1
मैं यही ठीक हूँ
बैसाख के महीने में तेज हवाओं में गेहूँ की बालियां सड़क के दोनों ओर लहरा रही थीं।
बस तेज रफ़्तार से अपने गंतव्य की ओर दौड़ी चली जा रही थी।देर रात तक पढ़ते रहने के कारण न चाहते हुए भी मुझे झपकी आ गई। मेरा आज बी•ए• अन्तिम वर्ष की परीक्षा का दूसरा पेपर था।
सामने से आ रहे वाहन को साइड देने के लिए जैसे ही चालक ने ब्रेक लगाए मेरी आँखें उस झटके में खुल गई।
देखा तो बस की खिड़की के पास ही एक सुन्दर व युवा लड़की खड़ी थी। शायद पिछले ही बस स्टाप से चढ़ी होगी।
बस खचाखच भरी हुई थी। वह अपने-आपको किसी के स्पर्श से बचाती हुई सिकुड़ी हुई खड़ी थी। भीड़ का फायदा उठाकर उसका हाथ दबाते हुए एक युवक को मैंने देख लिया। मैंने अपनी सीट से लगभग खड़े होते हुए उसे आवाज लगाकर कहा कि आप यहाँ आ जाइए।
थैंक्यू....... मैं यही ठीक हूँ। उसका यह जवाब सुनकर मैं अपना-सा मुहँ लिए उसका भोला चेहरा देखता यह गया।
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