लघु कथा-3
कुछ
बस स्टैण्ड में खड़ी बस यात्रियों से खचाखच भरी थी।जो यात्री सीटों पर बैठे थे उन्हें तो कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन जो यात्री खड़े थे उनकी हालत खराब थी।कुछ के तो दोनों पैर ढँग से नीचे भी न टिक पाए थे और वे एक ही पैर के सहारे खड़े थे।
जैसे ही बस चलने को होती है आठ-दस लड़कों का एक झुण्ड बस के पास आकर खड़ा हो जाता है। जिनके हाथों में पुस्तक/काॅपी और जेब में पैन टंगा देखकर विद्यार्थी होने का भ्रम होता है।
उनमें से एक बस के अगले दरवाजे से और एक पिछले दरवाजे से अन्दर घूसकर बस के अन्दर एक जासूसी निगाह दौड़ाते हैं।
नीचे खड़े लड़कों में से एक आवाज लगाकर पूछता है- 'कुछ' है क्या...?
इसमें तो कुछ भी नहीं........
अगली बस से चलेंगे
(धीरे-धीरे चलती बस से कूदते हुए)
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