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लघु कथा-3

                            कुछ    बस स्टैण्ड में खड़ी बस यात्रियों से खचाखच भरी थी।जो यात्री सीटों पर बैठे थे उन्हें तो कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन जो यात्री खड़े थे उनकी हालत खराब थी।कुछ के तो दोनों पैर ढँग से नीचे भी न टिक पाए थे और वे एक ही पैर के सहारे खड़े थे।    जैसे ही बस चलने को होती है आठ-दस लड़कों का एक झुण्ड बस के पास आकर खड़ा हो जाता है। जिनके हाथों में पुस्तक/काॅपी और जेब में पैन टंगा देखकर विद्यार्थी होने का भ्रम होता है।    उनमें से एक बस के अगले दरवाजे से और एक पिछले दरवाजे से अन्दर घूसकर बस के अन्दर एक जासूसी निगाह दौड़ाते हैं।    नीचे खड़े लड़कों में से एक आवाज लगाकर पूछता है- 'कुछ' है क्या...?    इसमें तो कुछ भी नहीं........    अगली बस से चलेंगे   (धीरे-धीरे चलती बस से कूदते हुए)

लघु कथा-2

                    बुरा ज़माना    महेश के घर में उत्सव जैसा माहौल था। घर के सभी सदस्यों के चेहरों पर प्रसन्नता व उल्लास साफ झलक रहा था। घर में कुछ खास मेहमान भी आए हुए थे। महेश ने अपनी सारी बिरादरी व गाँव के अपने चेहतों को भी आमंत्रित कर रखा था। उनके पड़ोसी गोपाल की बुआ लक्ष्मी आज वर्षों बाद मायके आई थी।चूंकि महेश का घर रास्ते में पड़ता था, वह गली से गुजर रही थी तो महेश के पिता ने उसे आवाज लगाकर अपने घर बुला लिया। उससे मन ही मन सोचा कि शायद किसी की शादी है। फिर उसे ध्यान आया कि इस घर में तो शादी लायक कोई लड़का या लड़की है ही नहीं। वह इस धूम-धड़ाके का कारण जानने के लिए बेचैन हो उठी।    इसी बीच किसी ने उसको बताया कि यह सब धूम-धड़ाका महेश के घर में पैदा हुई लड़की की 'छठी' का है। यह सुनकर किसी से बात किए बिना वह बड़बड़ा रही थी, क्या बुरा ज़माना आ गया है। लड़की के जन्म पर भी कहीं इतना इतराते हैं।

लघु कथा-1

                     मैं यही  ठीक हूँ    बैसाख के महीने में तेज हवाओं में गेहूँ की बालियां सड़क के दोनों ओर लहरा रही थीं।        बस तेज रफ़्तार से अपने गंतव्य की ओर दौड़ी चली जा रही थी।देर रात तक पढ़ते रहने के कारण न चाहते हुए भी मुझे झपकी आ गई। मेरा आज बी•ए• अन्तिम वर्ष की परीक्षा का दूसरा पेपर था।      सामने से आ रहे वाहन को साइड देने के लिए जैसे ही चालक ने ब्रेक लगाए मेरी आँखें उस झटके में खुल गई।    देखा तो बस की खिड़की के पास ही एक सुन्दर व युवा लड़की खड़ी थी। शायद पिछले ही बस स्टाप से चढ़ी होगी।    बस खचाखच भरी हुई थी। वह अपने-आपको किसी के स्पर्श से बचाती हुई सिकुड़ी हुई खड़ी थी। भीड़ का फायदा उठाकर उसका हाथ दबाते हुए एक युवक को मैंने देख लिया। मैंने अपनी सीट से लगभग खड़े होते हुए उसे आवाज लगाकर कहा कि आप यहाँ आ जाइए।    थैंक्यू....... मैं यही ठीक हूँ। उसका यह जवाब सुनकर मैं अपना-सा मुहँ लिए उसका भोला चेहरा देखता यह गया।        ...